The transcript discusses India's ambition to become a $5 trillion economy and critiques the credibility of its GDP data. It highlights concerns raised by the International Monetary Fund (IMF) regarding the quality of India's economic data, categorizing it as Grade C. The video, presented by Shruti, aims to explore the underlying problems affecting GDP calculations and the broader economic picture.
"Intercontinental Monetary Fund ने इंडिया की जीडीपी पर बड़े सवाल उठाए हैं। हमारी डाटा क्वालिटी को सी ग्रेड में डाल दिया है।"
The video presents a critical perspective on India's economic trajectory, emphasizing the need for accurate data to inform policy and public understanding. As India strives for significant growth, addressing these foundational data issues will be crucial for sustainable economic development.
वो दिन दूर नहीं जब भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बन जाएगा। 5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी का सपना ये 2025 में पूरा होने वाला था। फिर कहा गया थोड़ा आगे। फिर कहा गया थोड़ा और आगे और अब गोल पोस्ट शिफ्ट हो गया है 2029 में। सिर्फ टाइमलाइन नहीं जीडीपी के जो आंकड़े आते हैं उनकी क्रेडिबिलिटी को लेकर भी एक्सपर्ट्स ने कई बार सवाल उठाए हैं। और अगर उन सबको साइड रख दें तो एकदम फ्रेश कमेंट आया है आईएमएफ का। इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड ने इंडिया की जीडीपी पर बड़े सवाल उठाए हैं। हमारी डाटा क्वालिटी को सी ग्रेड में डाल दिया है। माने थर्ड क्लास। दूसरी सबसे खराब कैटेगरी इसके नीचे बस डी कैटेगरी है। तो आज जानेंगे कि प्रॉब्लम क्या है? इंडिया की ग्रोथ के डाटा में। जानेंगे कि जानकार क्या कहते हैं क्योंकि बुखार नापेंगे नहीं तो पता कैसे चलेगा कि दवाई कौन सी देनी है। हाय, मैं हूं श्रुति और आप देख रहे हैं खर्चा पानी। सबसे पहले जीडीपी को ही समझते हैं। जीडीपी मतलब ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट। जीडीपी मतलब किसी भी देश की सीमाओं के अंदर एक साल में जो भी फाइनल गुड्स एंड सर्विसेज बिकते हैं उनकी टोटल वैल्यू। फाइनल गुड्स एंड सर्विज मतलब एंड प्रोडक्ट फाइनल चीज जो बाजार में बिकी। इसे तीन तरीकों से गिना जा सकता है प्रोडक्शन से कि कितना सामान या सर्विज पैदा हुए। इनकम से, लोगों ने और कंपनियों ने कुल मिलाकर कितनी कमाई की और एक्सपेंडिचर से। देश में कुल कितना खर्च हुआ। इंडिया की जीडीपी का हिसाब किताब नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस करता है जो मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स के अंदर आता है। यही ऑफिस हर क्वार्टर और हर साल में जीडीपी का नंबर निकालता है। अब आते हैं कि ये सी ग्रेड वाला मैटर क्या है? इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड ये ध्यान रखती है कि अलग-अलग देशों की आर्थिक स्थिति ठीक रहे। किसी को लोन चाहिए तो वो देती है। कई बार कुछ ऊटपटांग हरकतें करने वाले देशों को भी दे देती है। फिलहाल उस गली नहीं जाते हैं। तो इन्होंने एक रिपोर्ट निकाली जिसमें इंडिया के नेशनल अकाउंट्स जिनमें जीडीपी भी शामिल है उसमें उनको सी ग्रेड दिया है। उनका साफ कहना है कि डाटा की फ्रीक्वेंसी और टाइमिंग ठीक-ठाक है लेकिन कैलकुलेशन के तरीके में कमियां हैं। यह पहली बात नहीं है कि इन आंकड़ों की क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठे हो और प्रॉब्लम्स काफी हैं। आज हम कुछ मेन प्रॉब्लम्स पर बात करेंगे। पहला है पुराना बेस ईयर। ऐसे समझिए कि आप मम्मी से कहते हैं बाजार से ब्रेड लानी है ₹50 दे दो। पलट के मम्मी कहे कि 2011 में तो ₹20 की ब्रेड मिलती थी। मैं तो 20 ही दूंगी। आप बोलेंगी अरे मम्मी आज के रेट में तो चीजें खरीदनी पड़ेंगी ना। 2011 वाला रेट तो पुराना हो गया। बस यही प्रॉब्लम जीडीपी को कैलकुलेट करते वक्त है। रियल जीडीपी निकालने के लिए इंडिया अभी भी 2011-12 की कीमतों को बेस मानता है। मतलब आज 2025-26 में जो भी प्रोडक्शन हो रहा है उसे 2011-12 वाली कीमतों से नापा जा रहा है। 2011-12 के बाद से इकॉनमी का स्ट्रक्चर बदल चुका है। आईटी, डिजिटल सर्विज, ई-कॉमर्स, गिग इकॉनमी, फिनटेक, oटीt इन जैसे नए सेक्टर्स आए हैं। बीच में कोविड आया और गया। दुनिया भर में वॉर्स भी हो गई। लेकिन रियल जीडीपी और कई दूसरे ऑफिशियल आंकड़े अभी भी 2011-12 बेस ईयर के वजन से गिने जा रहे हैं। फिलहाल सरकार ने एक नई कमेट बनाई है। सोच रहे हैं कि 2022-23 को नया बेस ईयर बनाया जाए। प्लान है कि 2026 में इसे लागू किया जाएगा। दूसरा है महंगाई को नापने का तरीका। हमारे देश में कंज्यूमर्स मतलब आप और हम कैसे महंगाई फील कर रहे हैं। यह सीपीआई तय करता है। यानी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स। कांसेप्ट सिंपल है। सरकार कुछ चीजें मिलाकर एक बास्केट बनाती है। एक टोकरी बनाती है। हमारी रोजमर्रा की चीजें जैसे खाना पीना, कपड़े, घर का किराया, बिजली, पेट्रोल, दवा, स्कूल और हर महीने देखती है कि इस टोकरी का टोटल खर्च कितना बदला है, बढ़ा है या कम हुआ है? अब इसके साथ प्रॉब्लम क्या है? ये बास्केट लास्ट 2012 में बनी थी। तब ना ऑनलाइन फूड डिलीवरी होती थी, ना oटीt के खर्चे इतने थे। स्मार्टफोन ईएमआई, एप्स बेस्ड कैब, Zomato, SWGI, जिम, प्राइवेट हेल्थ केयर, कोचिंग, एग्जाम प्रप इनमें से कई चीजें सीपीआई की टोकरी में या तो अंडर रिप्रेजेंटेड है या है ही नहीं। कई लोगों की जिंदगी में ओटीटी, जिम, कैब, कोचिंग इन सबका बिल बहुत बड़ा हिस्सा है। लेकिन सरकार की महंगाई की टोकरी अभी भी ज्यादातर अनाज, सब्जी, किराया, बिजली, पानी उसी पर अटकी हुई है। मतलब महंगाई का नंबर जो दिख रहा है वो वैसा है नहीं। इस पूरी इनफ्लेशन मेजरमेंट की क्वालिटी को भी अलग से बी ग्रेड दिया गया है। तीसरी प्रॉब्लम है सीजनल वेरिएशंस। उसको एडजस्ट ना करना। भारत जैसी इकॉनमी में दिवाली सीजन, शादी सीजन, हार्वेस्ट का सीजन इसमें अचानक लोगों का खर्चा एक्सप्ललोड कर जाता है। रिकॉर्ड फेस्टिव सेल्स होती हैं। फिर कुछ महीनों में डिमांड कमजोर हो जाती है। और इनमें बहुत अंतर देखने को मिलता है। मान लो आपने पांच टेस्ट दिए, दो में आपके 95 आए और तीन में आपके 40 नंबर। सिर्फ एवरेज देखोगे तो कागज पर आपको स्कोर ठीक-ठाक लगेगा। पर क्या वो सही पिक्चर है? आपने ओवरऑल ठीक किया। इसका मतलब यह थोड़ी ना है कि बाकी कमजोरियां खत्म हो गई। ऐसे ही देश की जीडीपी में भी होता है। फेस्टिव क्वार्टर अच्छा गया, जीएसटी कट्स हुए, ऑफर्स हुए। इन सब की वजह से अगर कंसमशन उछलता है तो बाकी क्वटर्स में जो रूरल डिस्ट्रेस है, जो जॉबलेसनेस है, वीक वेजेस हैं उनके असर का क्या? ऐसे ऊपर नीचे हो रहे ग्राफ को एडजस्ट करना जरूरी है ताकि सही तस्वीर सामने आए ताकि देश में पॉलिसी बनाने वाले समझे कि दिक्कत कहां है। और फोर्थ पॉइंट है इनफॉर्मल इकॉनमी। भारत की अर्थव्यवस्था का लगभग 50% हिस्सा और 80 से 90% रोजगार अनौपचारिक क्षेत्र यानी इनफॉर्मल सेक्टर से आता है। जिसमें छोटे दुकानदार, बिनेसेस, गिग वर्कर्स, डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर्स, मजदूर ये सब शामिल है। इसमें कोई कॉन्ट्रैक्ट, सोशल सिक्योरिटी, पेंशन, रजिस्ट्रेशन ये सब होता ही नहीं है। इसीलिए इसको अनऑर्गेनाइज्ड भी बोलते हैं। ये इनफॉर्मल होता है। आप सोचो इतनी बड़ी इकॉनमी और उसमें इतने ज्यादा लोग लेकिन इन पर प्रॉपर हाई फ्रीक्वेंसी डेटा है ही नहीं। अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर के सर्वेज होते हैं जैसे एएसयू एसई ये कई-कई साल बाद होते हैं। आईएमएफ और कई रिसर्चरर्स यही कहते हैं कि जब इनफॉर्मल सेक्टर आपकी अर्थव्यवस्था का एक आधार हो। उसका रेगुलर डाटा ना हो तो जीडीपी के नंबर पर नेचुरली सवाल खड़े हो जाते हैं। सुनते हैं कि एक्सपर्ट क्या कहते हैं। बहुत सारे इनफॉर्मल सेक्टर ऐसे हैं जिसके डेटा को हम कैप्चर ही नहीं कर पाते हैं। उनके डेटा को हम कैप्चर ही नहीं कर पाते हैं। जैसे मान लीजिए कि पब्लिक एक्सपेंडिचर के डेटा को तो हम कैप्चर कर लेते हैं। लेकिन जो प्राइवेट इन्वेस्ट एक्सपेंडिचर का डाटा है या रूरल एक्सपेंडिचर का डाटा है। जो गांव के लोग हैं जो खर्च करते हैं उस डाटा को हम कैप्चर ही नहीं कर पाते। कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स कब का है? 2011-12 बेस ईयर है। यानी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स में जो कंपोनेंट है जो फूड के कंपोनेंट है वो अभी भी 46% उसका वेट है। इमेजिन करिए कि हम 111 के इनफ्लेशन इंडेक्स पे चल रहे हैं। जबकि हम वी आर लिविंग इन 2025 डेट प्रैक्टिस है। दैट इज ग्रेड सी। तो ग्रेड सी होने के पीछे रीजन यही है। अब बात करेंगे 2025 के क्वार्टर टू के जीडीपी नंबर्स की। यह आज यानी 28 नवंबर 2025 को आए हैं। जुलाई, अगस्त और सितंबर के महीनों में जीडीपी ग्रोथ रेट रही है 8.2%। ये एनालिस्ट के प्रेडिक्शन से कई ज्यादा है। पिछले साल भी इसी क्वार्टर में देखें तो 5.6% थी। क्रेडिट वेयर इट्स ड्यू। कुछ सेक्टर्स की ग्रोथ अच्छी रही। सबसे पहले मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और उसके बाद होटल एंड ट्रांसपोर्ट वाले सेक्टर में भी अच्छी ग्रोथ हुई। सुनते हैं एक्सपर्ट क्या कहते हैं इस बारे में। तो सीजनल वेरिएशन को एडजस्ट नहीं कर पाने से के पीछे रीजन ये है कि मानसून सीजन में क्या है कि आपका जो जीडीपी है वो बढ़ जाता है। ठीक? तो बढ़ जाने के कारण q2 में यह परफॉर्मेंस अच्छी आ सकती है। जो जिओपॉलिटिकल प्रॉब्लम चल रही है जैसे टेरिफ वार ही चल रहा है। तो टेरिफ वार के बाद भी इंडिया का परफॉर्मेंस अच्छा है। क्योंकि सर्विस और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर बेटर किया है। तो सर्विस और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर बेटर करने के पीछे जो सबसे बड़ा रीजन जो मुझे ऐसा लगता है कि डिमांड ज्यादा क्रिएट हुआ है। अब देखिए ये पूरी कहानी सुनकर दो रिएशंस हो सकते हैं। एक यह कि सारे नंबर्स झूठे हैं और दूसरा यह कि सब परफेक्ट है। कोई प्रॉब्लम ही नहीं है। देखिए दोनों ही गलत है। सच्चाई कहीं बीच में है जैसे आईएमएफ ने कहा है कि इंडियन इकॉनमी आगे तो बढ़ रही है लेकिन कितनी तेजी से कौन से सेक्टर्स और कहां दिक्कतें हैं ये डाटा शायद उतना क्लियर नहीं है। जो गैप्स आज एपिसोड में हमने समझे उनके बाद नेचुरल सा सवाल है कि कौन से नंबर सच है। और इसी सवाल का इंस्टीट्यूशनल जवाब है आईएमएफ का सी ग्रेड। और अब बॉल सरकार के पाले में है कि वो इसको किस तरह एड्रेस करना चाहते हैं। एंड गवर्नमेंट नोस बॉल। आप आज के जीडीपी नंबर्स को लेकर क्या सोचते हैं? क्या यह ग्रोथ आपके आसपास रिफ्लेक्ट हो रही है? क्या बदलाव नजर आते हैं? कमेंट्स में बताइए। आज का खर्चा पानी यहीं तक। अपना ख्याल रखिए और देखते रहिए द लर्न टॉक।
Kharcha Pani | Episode 1224 | 28th November, 2025 India's GDP growth looks dazzling at 8.2% in Q2, but why did the IMF slap a 'C' grade on our data quality- the second-lowest category? From outdated 2011-12 base year ignoring IT, fintech, and gig economy shifts, to a 2012 CPI basket missing OTT, Zomato, and coaching costs. Seasonal spikes like Diwali unadjusted, and informal sector tracking (50% of economy!)- these gaps make real progress hard to gauge. Join us as we unpack expert takes, manufacturing booms, and why better data is key for smart policies. Does 8% growth reflect your life- rising costs or real gains? Comment below! Like, share, subscribe for more explainers. The copyright ownership in the video rests with India Today Group. No third party is permitted to use the video without obtaining the permission of India Today Group. Any permission for usage can be obtained through the email ID provided here: mail@lallantop.com. न्यूज़ लेटर के लिए क्लिक करें : https://www.thelallantop.com/newsletter खबरों को विस्तार से पढ़ने के लिए क्लिक करें यहां : https://www.thelallantop.com/ Instagram: @thelallantop Facebook: @thelallantop Twitter: @TheLallantop Production: Shruti Video Editor: Ved